ज्योतिष शास्त्र में काल सर्प दोष एक अत्यंत प्रभावशाली ग्रह दोष माना जाता है। यह
तब बनता है जब किसी जातक की जन्म कुंडली में सभी सात ग्रह—सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र
और शनि—राहु और केतु के बीच एक ओर स्थित हो जाते हैं। राहु को सर्प का मुख और केतु को सर्प की पूंछ
कहा जाता है, इसीलिए इसे काल सर्प दोष कहते हैं।
यह दोष व्यक्ति के जीवन के हर पहलू—विवाह, करियर, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और मानसिक शांति—को
प्रभावित करता है। उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर इस दोष के निवारण के लिए विश्व का सबसे प्रमुख
स्थान है।
काल सर्प दोष के 12 प्रकार
राहु और केतु की कुंडली
में स्थिति के अनुसार काल सर्प दोष के बारह प्रकार होते हैं:
- 1. अनंत — राहु लग्न में, केतु सप्तम में
- 2. कुलिक — राहु द्वितीय में, केतु अष्टम में
- 3. वासुकी — राहु तृतीय में, केतु नवम में
- 4. शंखपाल — राहु चतुर्थ में, केतु दशम में
- 5. पद्म — राहु पंचम में, केतु एकादश में
- 6. महापद्म — राहु षष्ठम में, केतु द्वादश में
- 7. तक्षक — राहु सप्तम में, केतु लग्न में
- 8. कर्कोटक — राहु अष्टम में, केतु द्वितीय में
- 9. शंखचूड़ — राहु नवम में, केतु तृतीय में
- 10. घातक — राहु दशम में, केतु चतुर्थ में
- 11. विषधर — राहु एकादश में, केतु पंचम में
- 12. शेषनाग — राहु द्वादश में, केतु षष्ठम में